कुछ यादें गुज़रे हुए पलों की .......

Tuesday, 9 April 2013

इम्तिहान

मैं अपनी हर ग़ज़ल में तेरा नाम लिखता हूँ ,
कभी गुलशन, कभी चिलमन, तो कभी अंजुम लिखता हूँ ।

साया बनके चलने का वादा किया था किसी जन्म में तुझसे,
मैं आज भी तुझे अपना हमनाम लिखता हूँ ।

मेरा हर लफ्ज़ महके तेरी खुशबू से,
आज एक ऐसा सूफियाना कलाम लिखता हूँ ।

मेरी जुस्तजू को तेरी चाहत का किनारा नसीब हो,
आज फिर इश्क का ऐसा इम्तिहान लिखता हूँ ।

मेरी हस्ती का राज़ सिर्फ जिसे हो मालूम,
आ, तुझे अपना एक राज़दान लिखता हूँ ।।

                                                        -- दिवांशु गोयल 'स्पर्श'

#चिलमन - पर्दा (यहाँ पर्दानशीं)
   अंजुम - सितारे
   जुस्तजू- तलाश, खोज
   राजदान - सारे राज़ जानने वाला 

Wednesday, 3 April 2013

मैं एक वृक्ष हूँ

एक छोटी सी कोशिश की कुछ लिखने की......!

बूढा हो चला हूँ मैं,
पत्तों की रंगत बदलने लगी है,
खड़े रहने की ताकत अब मुझमे नही,
खड़ा रहता हूँ मगर,
शायद कोई छाँव के लिए पूछ ले।

शाख भी कमज़ोर सी पड़ती हैं,
दरारों से भर गयी हैं,
खड़ा रहता हूँ मगर,
शायद कभी बिटिया झूला डाल ले।

एक आँगन में गुज़ारा है बचपन मैंने,
सब बड़ा प्यार करते थे,
तीन बच्चों में सबसे बड़ा था मैं,
आज सब दूर हो गये,
खड़ा रहता हूँ मगर,
शायद कोई प्यार से गले लगा ले,

एक दंश विभाजन का ऐसा भी झेला,
वो घर छोड़ विदा हुए सब,
कुछ इस पार कुछ उस पार,
अब कोई नही मेरे साथ खेलने को,
जड़ें भी बेहद कमज़ोर हो चली हैं,
खड़ा रहता हूँ मगर,
शायद कोई मेरा मोल पूछ ले।

और खड़ा रहूँगा मरते दम तक,
शायद तुम्हे मेरी जरूरत हो,
साथ नही छोडूंगा कभी,
क्योंकि मैं इंसान नही 'स्पर्श' ,
मैं एक वृक्ष हूँ।।

- दिवांशु गोयल 'स्पर्श'

बदनाम हो जाता है

सोच लो दुनिया वाले क्या कहेंगे तुम्हारे बारे में,
मुझसे जो मिलता है बदनाम हो जाता है।।

 इश्क की बारिश 

ये मुहब्बत की बात है मेरे रहबर,
संभालो तो बहकती है, संवारो तो महकती है।

कोई कोयल जरूर बैठी होगी कभी मेरी छत पे,
इसीलिए आज तेरी इश्क की घटायें इस तरह बरसती हैं ||

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