कुछ यादें गुज़रे हुए पलों की .......

Friday, 29 November 2013

१५ अगस्त



             १५ अगस्त का दिन था। मैं गांधी मैदान पर आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह में हिस्सा लेकर वापस अपने घर जाने के लिए बस स्टॉप पर खड़ा था। मन में अभी तक लाउडस्पीकर पर बजते देशभक्ति गीतों की गूँज थी। अन्य पढ़े लिखे लोगों की तुलना में खुद को बेहतर समझ रहा था कि चलो देश के लिए कुछ समय निकल ही लिया। गर्व से सीना थोडा ऊंचा था। 
           तभी अचानक एक छोटा सा लड़का कहीं से भागते भागते मेरे निकट आ खड़ा हुआ। पैरों में चप्पलें नहीं थी। सिर के बाल शायद किसी अरसे से कंघी नहीं किये थे। उसका कमज़ोर और जर्जर शरीर एक पतली सी कमीज़ से बाहर झाँक रहा था। उसे देखते ही मेरे समक्ष घृणा की एक तस्वीर उभर आयी। 

उसने मिन्नतों भरे स्वर में कहा- "बाबूजी।" 

मेरी चढ़ी हुई त्योरियों को शायद ये पसंद नहीं आया और मैंने झुंझलाकर कहा, "क्या है? पैसे नहीं हैं मेरे पास। जा भाग यहाँ से।" 

एक छोटी सी हंसी के साथ अपनी आवाज में वो थोड़ी और मासूमियत डालते हुए बोला," बाबूजी, पैसे नहीं मांग रहा।" 

 उसका इतना कहना था कि मेरी अचरज भरी निगाहों ने सिर से पैर तक उसका मुआयना कर डाला। मैं अपनी बौद्धिक क्षमता को परास्त समझ धीरे से बोला," तो फिर? क्या चाहिए तुझे?" 

वो फिर से उसी विनती भरे स्वर में बोला," बाबूजी, जरा पैर हटाएंगे?" 

 थोडा आश्चर्य तो हुआ पर मैं समझा शायद इसकी कोई वस्तु मेरे पैर के नीचे दब गयी होगी, ये सोचकर जैसे ही मैंने अपना पैर हटाया- 

'नीचे पड़े एक छोटे से तिरंगे को उठाकर उसने माथे पे लगाया और फुर्र से वहीं कहीं गायब हो गया।

-दिवांशु गोयल 'स्पर्श' 

Sunday, 20 October 2013

जीवन का पहिया


एक कागज़ के, ज़मीन पर बिखरे कुछ टुकड़े, टुकुर-टुकुर ताकते हैं, उस घूमते पंखे की, परछाईओं को, वो बेबस घडी, जिसकी सुईयां, जैसे-जैसे चलती हैं, सीने में गड़ती हैं, खिड़की बेरंग है मगर, सारे रंग दिखाती है, पहिया लुढ़काते दो बच्चे, चीथड़े बदन पर हैं, चार पहियों की एक गाड़ी को, बेबसी से घूरते हैं, शायद यही है, जीवन का पहिया! सामने की छत पर, कपडे सुखाती एक औरत, साथ में खेलते दो बच्चे, या कुछ सपने, टेबल पर पड़ा एक, फटा मेजपोश, जो गवाह है, पड़ोस से आती, अजान की आवाज का, बगल में पड़ा एक, कुचैला सा थैला, जब ख़रीदा गया था, नया था एकदम, बड़े अरमान जो सजे थे, अगरबत्ती के धुएँ से अटा, मेरा कमरा, या कहूं तो! मेरा भविष्य, मेज़ की दराजों में पड़े, बेतरतीब से कागज़, मेरी हालत बयां करने की, ताकत रखते हैं, मेजपोश पे पड़ी, सूखी सी कलम, और उसका बोझ सहता, एक काला सा कागज़, बस सही मायनो में, यही किये जा रहा हूँ, कलम को कागज़ पे, घिसे जा रहा हूँ, घिसे जा रहा हूँ।। -दिवांशु

Wednesday, 25 September 2013

पैरों के निशान



मैं हिमालय की उस घाटी में,
जो दुर्गम, गहन, गंभीर थी,
उतरता चला गया,
विचारों के प्रतिरूप में,
ढलता चला गया .......

जो प्रतिबिम्ब मिले थे राह में,
अतीत की चादर ओढ़े हुए,
पाँव बाहर निकालते थे,
भविष्य की थाह लेने को,
मैं उस निर्जीव रास्ते पे,
चलता चला गया,
उम्मीद के बादलों में,
घुलता चला गया ........

कुछ धुप के धुंधले,
कुछ अंधियारे से उजले,
फलक की ओर ताकते,
सूखी घास में दबे हुए,
उस पौधे से मैं,
बतियाता चला गया,
ज़मीं पे पैरों के निशान,
बनाता चला गया ।।

-दिवांशु गोयल 'स्पर्श'

Sunday, 18 August 2013

तकाज़ा

 
 
मर कर भी वो परिंदा बेख़ौफ़ चलता रहा,
लोग जश्न मनाते रहे, मैं जलता रहा,

दिवाली की रात हो या ईद की नमाज़,
ये शहर अब तलक क्यूँ दहलता रहा,

वो जिहाद को आईना न दिखा सका,
पिंजरे में बंद इन्कलाब मचलता रहा,

मैं गुमराह था की वो मुश्फ़िक* है मेरा,
वो अपना रंग कदम दर कदम बदलता रहा।

इस दुनिया ने तकाज़ा कुछ इस तरह किया,
मैं ठोकरें खाते खाते संभालता रहा।

*मुश्फिक- दोस्त

-दिवांशु

Tuesday, 9 July 2013

राहुल के पापा



शाम के ७ बजे थे । हर रोज़ की तरह विकास अपना स्कूल का होमवर्क निपटा के खेलने में व्यस्त हो गया । तभी दरवाजे पर घंटी बजी । विकास घंटी की आवाज सुनकर दरवाजे की ओर लपका, जैसे उसे पहले से ही पता हो की वहां कौन है । दरवाजा खुलने की ही देर थी की वो तुरंत सामने खड़े आदमी से जा चिपका और जोर से चिल्लाया- माँ ,माँ, चाचाजी आये हैं। उसकी आवाज में ख़ुशी साफ़ झलक रही थी । माँ रसोईघर से बाहर आ गयी और उन्हें बैठने को कहा । मगर विकास की नज़र तो चाचाजी के थैले पर थी ।
"अरे हाँ भई, लाया हूँ । आज तुम्हारे लिए ये सेब और ये रिमोट वाली कार लाया हूँ ।" चाचाजी विकास की व्यग्रता ताड़ते हुए बोले । उसे और क्या चाहिए था, बस कार लेके ऐसा उड़नछू हुआ की पूछो मत ।
"भाईसाहब, क्या जरुरत थी इन सब की?" विकास की माँ ने झेंपते हुए कुछ व्याकुलता भरे स्वर में कहा ।
"अरे! कैसी जरुरत भाभी? विकास मेरे भी बेटे जैसा है, आखिर हूँ तो मैं उसका सगा चाचा ही, और फिर मैं जो अपने बेटे राहुल के लिए लाता हूँ, वही विकास के लिए भी ले आता हूँ । दोनों हमउम्र हैं, पसंद- नापसंद एक सी । बस । चाचाजी ने एक सांस में अपनी बात कह दी। इस पर माँ कुछ नही बोल पाईं बस विकास के खिलखिलाते चेहरे और चाचाजी की संतुष्टि भरी मुस्कान को देखकर खुद को राज़ी कर लिया ।
रात को विकास के पापा जब खाने की टेबल पर बैठे थे तो माँ खाना परोसते हुए कुछ गुस्से में बोली-"अजी सुनते हो । ये आजकल भाईसाहब हर रोज़ विकास के लिए कुछ न कुछ लेकर आते हैं । ये अच्छी बात नही है, मैं कहे देती हूँ।"
विकास के पापा कुछ उदासीन से स्वर में बोले-"हाँ तो क्या हुआ इसमें छोटा सा तोहफा ही तो है। और वैसे भी वो विकास को अपना सगा बेटा मानता है, इसमें बुरा क्या है?"
दूसरी ओर विकास अपनी प्लेट में चुपचाप नीचे देखते हुए सब सुन रहा था । शायद उसके माँ-बाप को ये नही मालूम था की ये बातें उस कच्ची मिटटी में किस रूप में ढलने वाली हैं ।
"अजी आप तो कुछ समझते ही नही हो ।" अचानक माँ का स्वर कुछ तेज़ हुआ ।
"विकास का तो केवल बहाना है । हमसे ज्यादा पैसे वाले हैं न वो बस इसी बात का दिखावा करने रोज़ कुछ न कुछ न ले आते हैं। अरे हम क्या हमारे बच्चे को खिला-पिला नही सकते, या उसे खिलौने नही दिला सकते। अगर इतना ही पैसा है तो जाके अपने बच्चे पे खर्च करे, हम पर अहसान करने की क्या जरूरत है। भगवन न करे एक न एक दिन इसी एहसान को हमारे ऊपर इस्तेमाल करेंगे वो। और ये रोज़ रोज़ की नवाबी न हमारे ही बच्चे की आदत बिगाड़ेगी, कल को जब हमसे असली की कार मांगेगा जब कहाँ से लाकर देंगे हम । कहना अपने भाई से फिर वही देंगे।"
अब तक ये बातें उसके मन पर गहरी छाप छोड़ चुकी थी ।
अगले दिन शाम को फिर दरवाजे पे घंटी बजी । विकास को इस बार भी पता था की दरवाजे पे कौन है। लेकिन इस बार न तो उसकी चाल में वो तेजी थी और न ही चेहरे पे वो चमक । दरवाजा खोलने पर वो आज उनसे चिपका नहीं, मगर आवाज जरुर दी- माँ, "राहुल के पापा" आये हैं ।
-दिवांशु गोयल

Friday, 28 June 2013

क्या कभी ऐसा होगा?


क्या कभी ऐसा होगा? एक सवाल खुद से…. 
क्या मेरी ये ज़िन्दगी सिर्फ प्रेम-पथ पर ही बढ़ेगी,
क्या मेरी ये जवानी श्रृंगार में व्यर्थ ही ढलेगी,
क्या मेरी कहानी का भी बस यही अंजाम होगा,
क्या मुझे कभी ओज की उस लेखनी पर अभिमान होगा,

क्या मुझे कभी स्वप्न भी इस धरा के आयेंगे,
क्या मेरे ये अंग भी किसी रोज़ काम आयेंगे,
कब मुझे फकीरों की फकीरी पे मान होगा,
कब मुझे उन हिन्द के वीरों पे अभिमान होगा,

कब मेरे गीतों से देशभक्ति की गंगा बहेगी,
कब मेरी कोशिश को कामयाबी की संज्ञा मिलेगी,
कब मुझे आत्म की ताकत का संज्ञान होगा,
क्या मेरे रथ पे भी कोई कृष्ण विराजमान होगा,

कब मेरा इस देश की मिट्टी से श्रृंगार होगा,
कब मेरे मन में उफनती लहरों का सा ज्वार होगा,
कब मेरे प्राणों को तपती रेत सी ज्वाला मिलेगी,
कब मेरी इस भूमि पे शहीदों सी चिता जलेगी,

कौन तेरी रक्त की बूंदों का प्रतिशोध लेगा,
क्या मेरी इस देह को कभी इतना बल मिलेगा,
क्या परवानों की बस्ती में मेरा भी एक नाम होगा,
क्या तिरंगे में लिपटने का मुझे कभी गुमान होगा।

-दिवांशु गोयल 'स्पर्श'

Saturday, 8 June 2013

मेरा अभिमान हो

आज मुझे फिर इस बात का गुमान हो,
मस्जिद में भजन, मंदिरों में अज़ान हो,

खून का रंग फिर एक जैसा हो,
तुम मनाओ दिवाली ,मैं कहूं रमजान हो,

तेरे घर भगवान की पूजा हो,
मेरे घर भी रखी एक कुरान हो,

तुम सुनाओ छन्द 'निराला' के,
यहाँ 'ग़ालिब' से मेरी पहचान हो,

हिंदी की कलम तुम्हारी हो,
यहाँ उर्दू मेरी जुबान हो,

बस एक बात तुझमे मुझमे,
वतन की खातिर यहाँ समान हो,

मैं तिरंगे को बलिदान दूँ,
तुम तिरंगे पे कुर्बान हो।

                                      -दिवांशु गोयल 'स्पर्श'

Thursday, 23 May 2013

एक शिकायत है तुमसे

आज एक टूटी सी कलम मिली बस्ते में,
ये शायद वही है,
जिससे हम साथ लिखा करते थे,
मेरी कविता के नीचे अपना नाम भी,
तुमने इसी से लिखा था शायद,
तुम्हारे बिना कुछ उदास सी है आज,
कहो तो वो कलम भिजवा दूँ ......

क्या इतनी व्यस्त हो गयी हो तुम,
अब तो दुपहरी का बहाना भी बनाने लगी हो,
मेरी हंसाने की अदा की तो तुम कायल थी,
उसी का क़र्ज़ उतार दिया होता,
एक ख़त में अपनी हंसी भिजवा दी होती,
अभी भी फुर्सत के दो पल पड़े हैं मेरे पास,
कहो तो वो पल भिजवा दूँ .......

साथ बैठकर देखे वो सपने तो नहीं भूलीं न तुम,
बाल अभी भी खुले रखती हो या चोटी बाँध ली है,
एक रुपया उधार है तुम्हारा मुझ पे,
लौटने के बहाने मिलेगा किसी रोज़ 'स्पर्श',
मेरा दिया दुपट्टा ओढ़ के आना,
फिलहाल तो कुछ यादें ही अब शेष हैं मेरे पास,
कहो तो वो यादें भिजवा दूँ .........!!!

                                                             - दिवांशु गोयल 'स्पर्श'

Sunday, 12 May 2013

माँ, तुम बहुत याद आती हो मुझे







उस पीतल की थाली में,
रखे हुए कुछ,
चावल के दानों को,
बीनने की कोशिश करता हूँ जब,
माँ, तुम बहुत याद आती हो मुझे।

धो के, करीने से इस्त्री की हुई,
मेरे स्कूल की सफ़ेद शर्ट,
और आठवीं क्लास की सर्दियों में,
तुम्हारे बनाये उस स्वेटर को,
आज भी सोचता हूँ जब,
माँ, तुम बहुत याद आती हो मुझे।

तुम्हारे साथ रसोई में,
रोटियाँ बेलने की जिद और,
मेरे माथे पे तेरे कोमल हाथों का 'स्पर्श'
आज भी सोचता हूँ जब,
माँ, तुम बहुत याद आती हो मुझे।

                                 -दिवांशु गोयल 'स्पर्श'


Tuesday, 9 April 2013

इम्तिहान

मैं अपनी हर ग़ज़ल में तेरा नाम लिखता हूँ ,
कभी गुलशन, कभी चिलमन, तो कभी अंजुम लिखता हूँ ।

साया बनके चलने का वादा किया था किसी जन्म में तुझसे,
मैं आज भी तुझे अपना हमनाम लिखता हूँ ।

मेरा हर लफ्ज़ महके तेरी खुशबू से,
आज एक ऐसा सूफियाना कलाम लिखता हूँ ।

मेरी जुस्तजू को तेरी चाहत का किनारा नसीब हो,
आज फिर इश्क का ऐसा इम्तिहान लिखता हूँ ।

मेरी हस्ती का राज़ सिर्फ जिसे हो मालूम,
आ, तुझे अपना एक राज़दान लिखता हूँ ।।

                                                        -- दिवांशु गोयल 'स्पर्श'

#चिलमन - पर्दा (यहाँ पर्दानशीं)
   अंजुम - सितारे
   जुस्तजू- तलाश, खोज
   राजदान - सारे राज़ जानने वाला 

Wednesday, 3 April 2013

मैं एक वृक्ष हूँ

एक छोटी सी कोशिश की कुछ लिखने की......!

बूढा हो चला हूँ मैं,
पत्तों की रंगत बदलने लगी है,
खड़े रहने की ताकत अब मुझमे नही,
खड़ा रहता हूँ मगर,
शायद कोई छाँव के लिए पूछ ले।

शाख भी कमज़ोर सी पड़ती हैं,
दरारों से भर गयी हैं,
खड़ा रहता हूँ मगर,
शायद कभी बिटिया झूला डाल ले।

एक आँगन में गुज़ारा है बचपन मैंने,
सब बड़ा प्यार करते थे,
तीन बच्चों में सबसे बड़ा था मैं,
आज सब दूर हो गये,
खड़ा रहता हूँ मगर,
शायद कोई प्यार से गले लगा ले,

एक दंश विभाजन का ऐसा भी झेला,
वो घर छोड़ विदा हुए सब,
कुछ इस पार कुछ उस पार,
अब कोई नही मेरे साथ खेलने को,
जड़ें भी बेहद कमज़ोर हो चली हैं,
खड़ा रहता हूँ मगर,
शायद कोई मेरा मोल पूछ ले।

और खड़ा रहूँगा मरते दम तक,
शायद तुम्हे मेरी जरूरत हो,
साथ नही छोडूंगा कभी,
क्योंकि मैं इंसान नही 'स्पर्श' ,
मैं एक वृक्ष हूँ।।

- दिवांशु गोयल 'स्पर्श'

बदनाम हो जाता है

सोच लो दुनिया वाले क्या कहेंगे तुम्हारे बारे में,
मुझसे जो मिलता है बदनाम हो जाता है।।

 इश्क की बारिश 

ये मुहब्बत की बात है मेरे रहबर,
संभालो तो बहकती है, संवारो तो महकती है।

कोई कोयल जरूर बैठी होगी कभी मेरी छत पे,
इसीलिए आज तेरी इश्क की घटायें इस तरह बरसती हैं ||

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